इजरायल और लेबनान के बीच युद्ध विराम की घोषणा होते ही भूमध्य सागर की लहरों के नीचे हलचल तेज हो गई है। युद्ध शांत होते ही बेंजामिन नेतन्याहू की सरकार ने देश की तेल और नेचुरल गैस कंपनियों को एक बेहद कड़ा और स्पष्ट आदेश थमा दिया है। ये कोई सामान्य रूटीन अपडेट नहीं है। ये सीधे तौर पर इजरायल की ऊर्जा सुरक्षा और उसकी अर्थव्यवस्था की रीढ़ से जुड़ा फैसला है। सरकार ने साफ कर दिया है कि अब बहानेबाजी का वक्त खत्म हो चुका है। कंपनियों को तुरंत अपने गैस प्लेटफॉर्म्स को पूरी क्षमता के साथ चालू करना होगा।
युद्ध के दौरान सुरक्षा कारणों से कई बार उत्पादन रोकना पड़ा था। लेबनान की तरफ से दागे जा रहे रॉकेट और ड्रोन के साये में काम करना मुश्किल था। लेकिन अब जब तोपें शांत हैं, तो इजरायल अपनी अर्थव्यवस्था को फिर से पटरी पर लाने के लिए गैस निर्यात को हथियार बना रहा है।
इजरायली सरकार के नए फरमान की गहराई
इजरायल के ऊर्जा मंत्रालय ने लेविअथन (Leviathan) और तामार (Tamar) जैसे विशाल गैस क्षेत्रों का संचालन करने वाली कंपनियों को निर्देश दिया है कि वे अपनी सुरक्षा तैयारियों की समीक्षा करें और प्रोडक्शन को अधिकतम स्तर पर ले जाएं। ऊर्जा मंत्री एली कोहेन का रुख इसमें बहुत सख्त रहा है। उनका तर्क सीधा है। इजरायल को इस युद्ध में अरबों डॉलर का नुकसान हुआ है। इस घाटे की भरपाई केवल घरेलू टैक्स से नहीं हो सकती। इसके लिए गैस का विदेशी मुद्रा में निर्यात होना जरूरी है।
ये कंपनियां अब तक सुरक्षा प्रोटोकॉल का हवाला देकर धीमी गति से काम कर रही थीं। सरकार ने अब उनसे कहा है कि वे ऑफशोर प्लेटफॉर्म्स पर अपनी टेक्निकल जांच पूरी करें और सप्लाई चेन में आ रही बाधाओं को 48 घंटों के भीतर दूर करें। ये तेजी दिखाती है कि इजरायल अब मध्य पूर्व में एक 'एनर्जी हब' के रूप में अपनी स्थिति को कमजोर नहीं होने देना चाहता।
गैस निर्यात और भू-राजनीति का खेल
इजरायल सिर्फ अपने लिए गैस नहीं निकालता। उसकी गैस की पाइपलाइनें मिस्र और जॉर्डन तक जाती हैं। युद्ध के कारण जब सप्लाई बाधित हुई, तो इन पड़ोसी देशों में भी ऊर्जा संकट गहराने लगा था। इजरायल के नए आदेश का एक बड़ा हिस्सा इन अंतरराष्ट्रीय समझौतों को सम्मान देना है।
अगर इजरायल समय पर गैस नहीं देता, तो उसे भारी जुर्माना भरना पड़ सकता है। उससे भी बड़ी बात ये है कि उसकी साख पर आंच आती। मिस्र इजरायली गैस को लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) में बदलकर यूरोप भेजता है। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद से यूरोप वैसे ही गैस के लिए तरस रहा है। ऐसे में इजरायल का ये कदम केवल स्थानीय नहीं बल्कि ग्लोबल मार्केट को प्रभावित करने वाला है।
कंपनियों के सामने खड़ी असली चुनौतियां
कहना आसान है कि प्रोडक्शन बढ़ा दो, पर हकीकत थोड़ी जटिल है। कंपनियों के लिए सबसे बड़ी चिंता इंफ्रास्ट्रक्चर की सुरक्षा है। युद्ध विराम अक्सर नाजुक होते हैं। हिजबुल्लाह के पास अभी भी वो ताकत है कि वो समुद्र में मौजूद इन प्लेटफॉर्म्स को निशाना बना सके। कंपनियां घबराई हुई हैं कि अगर उन्होंने पूरी क्षमता से काम शुरू किया और फिर से तनाव बढ़ा, तो उनका अरबों का निवेश डूब सकता है।
इसके अलावा, युद्ध के दौरान कई विदेशी एक्सपर्ट्स और टेक्नीशियन्स इजरायल छोड़कर चले गए थे। उन्हें वापस बुलाना और फिर से काम पर लगाना रातों-रात संभव नहीं है। लॉजिस्टिक्स की ये कमी सरकार के आदेशों को लागू करने में सबसे बड़ा रोड़ा है। मुझे लगता है कि सरकार को आदेश देने के साथ-साथ इन कंपनियों को बीमा और सुरक्षा की ठोस गारंटी भी देनी होगी। सिर्फ कागजों पर युद्ध विराम होने से समुद्र के बीच में बैठे वर्कर सुरक्षित महसूस नहीं करते।
इजरायल का भविष्य और एनर्जी सिक्योरिटी
इजरायल अब अपनी समुद्री सीमा में नए गैस ब्लॉक्स की नीलामी करने की भी सोच रहा है। इस नए आदेश के जरिए वो दुनिया को संदेश दे रहा है कि इजरायल निवेश के लिए सुरक्षित है। युद्ध खत्म होने के तुरंत बाद ऊर्जा क्षेत्र पर ध्यान देना एक सोची-समझी आर्थिक रणनीति है।
इजरायल के पास फिलहाल लगभग 1000 बिलियन क्यूबिक मीटर (BCM) से ज्यादा गैस भंडार होने का अनुमान है। ये भंडार उसे अगले कई दशकों तक ऊर्जा के मामले में आत्मनिर्भर बनाए रखने के लिए काफी है। लेकिन ये तभी मुमकिन है जब लेविअथन के दूसरे चरण का विस्तार समय पर हो। सरकार का नया आदेश इसी विस्तार की नींव रख रहा है।
कंपनियों को अब अपनी ड्रिलिंग मशीनों को फिर से गर्म करना होगा। उन्हें ये समझना होगा कि इजरायल की नेशनल सिक्योरिटी अब उसकी गैस पाइपलाइनों से जुड़ी है। जो कंपनियां देरी करेंगी, उन्हें शायद भविष्य में नए लाइसेंस मिलने में दिक्कत हो सकती है।
अब सारा ध्यान इस बात पर है कि शेवरॉन (Chevron) जैसी दिग्गज कंपनियां इस सरकारी दबाव पर कैसे रिएक्ट करती हैं। उनके लिए ये सिर्फ मुनाफा नहीं, बल्कि एक युद्धग्रस्त क्षेत्र में बिजनेस करने की उनकी क्षमता का इम्तिहान भी है। इजरायल अपनी गैस के दम पर अपनी किस्मत बदलना चाहता है और ये नया आदेश उस दिशा में पहला बड़ा प्रहार है।
गैस कंपनियों को अब बिना देरी किए अपने रिस्क असेसमेंट पूरे करने चाहिए। उन्हें अपने टेक्निकल स्टाफ की वापसी के लिए चार्टर्ड फ्लाइट्स और स्पेशल परमिट्स का इंतजाम तुरंत करना होगा ताकि प्रोडक्शन में एक दिन का भी अतिरिक्त नुकसान न हो। सरकार के सख्त रवैये को देखते हुए देरी करना भारी पड़ सकता है।